ऊंची छतों पर हरी-भरी दुनिया

Author:रत्ना
Source:दैनिक भास्कर (रसरंग), 09 जून 2013
भीषण गर्मी में कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुके शहरों के मकान किस तरह भट्ठी में तब्दील हो जाते हैं, ये हममें से किसी से छिपा नहीं है, लेकिन मिट्टी और वनस्पतियों से युक्त ये छतें सीधी धूप को रोककर अवरोधक का काम करती हैं। जाहिर सी बात है कि इससे बिल्डिंग का तापमान कम हो जाता है। इससे बिल्डिंग की कूलिंग कास्ट करीब बीस फीसदी तक कम हो जाती है। जहां तक भारत की बात है तो भारत में ग्रीन रूफ्स या ग्रीन बिल्डिंग्स अभी दूर की कौड़ी लगती है। कुछ बड़े शहरों में इसकी पहल तो हो रही है लेकिन ये अभी न के बराबर है, लेकिन ये बात सही है कि अगर शहर इलाके की नई बिल्डिंग्स ग्रीन बिल्डिंग्स के कांसेप्ट को लागू करें तो भारत 3,400 मेगावाट बिजली बचा सकता है। जब पूरी दुनिया में बात ग्रीन वर्ल्ड की हो रही हो, दुनिया के तेजी से खत्म होते प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की बातें हो रही हों, तो ग्रीन हाउस की परिकल्पना बहुत तेजी से हकीक़त में बदल रही है, यानी ऐसे घर जो हरे-भरे हों, जहां छतों पर हरियाली लहलहाए। जहां छतों से रंग-बिरंगे फूल मुस्कराएं। हरे-भरे लॉन में मुलायम-सी घास हो, कुछ छोटे-बड़े पेड़-पौधे हों। ऐसी छतें हमारे देश में भले ही न हो, लेकिन अमेरिका और यूरोप में हकीक़त बनती जा रही हैं। ये ऐसी छतें होतीं हैं, जिन्हें ग्रीन टॉप या ग्रीन रूफ कहा जाता है। आने वाले समय में अपने देश में भी शायद छतों पर हरी-भरी दुनिया का नया संसार दिखेगा। छतें केवल छतें नहीं होंगी, बल्कि बगीचा होंगी, खेत होंगी, फार्महाउस होंगी, जिन पर आप चाहें तो खूब सब्जी पैदा करें। इन्हीं छतों से बिजली पैदा की जाएगी। इनसे घरों का तापमान कंट्रोल किया जा सकेगा। कुछ मायनों में एसी का काम करेंगी। इन्हीं के जरिए वाटरहार्वेस्टिंग का भी काम होगा। आप चकित होंगे, एक छत से इतने काम! क्या सचमुच छतें इतने काम की हैं। हां, साहब वाकई छतें बहुत काम की हैं। भले अभी तक हमने इनका महत्व नहीं पहचाना हो, लेकिन दुनियाभर में कम होती जमीनों और पर्यावरण के प्रति जागरूकता ने छतों को वो महत्व प्रदान कर ही दिया है, जो बहुत पहले हो जाना चाहिए था। जब हम ग्रीन रूफ यानी हरी-भरी छतों की बात कर रहे हैं, तो कोई अनोखी बात नहीं कह रहे। यूरोप और अमेरिका में अब कोई नया घर बनवाता है तो घर पर ग्रीन रूफ का प्रावधान रखना नहीं भूलता।

शिकागो सिटी को लोग दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक शहर के रूप में जानते हैं। दुनियाभर का सबसे बेहतर स्टील यहीं तैयार होता है। इस शहर में पिछले कुछ दिनों में एक खास बदलाव आया है। यहां कि ज्यादातर बिल्डिंग्स में छतों पर खूबसूरत लॉन बनने लगे हैं, जो पर्यावरण संतुलन में खास भूमिका निभा रहे हैं। कुछ साल पहले यहां के मेयर रिचर्ड डिले ने जब शहर की छतों में इस तरह के बदलाव का बीड़ा उठाया तो लोगों को विश्वास नहीं था उनका ये आइडिया शहर को इतना बदल देगा कि वो दुनियाभर के लिए उदाहरण बन सकेगा। अब शिकागो शहरो को लोग उत्तरी अमेरिका का हरी छतों वाला शहर कहने लगे हैं। वेंकूवर पब्लिक लाइब्रेरी की विशालकाय छत की ओर पहले कभी किसी का ध्यान ही नहीं गया, लेकिन 1985 में इसे एकदम बदल दिया गया। उसके बाद तो 20 हजार स्क्वायर फीट में फैली छत एकदम ही बदल गई। यहां का सन्नाटा जिंदगी के मधुर संगीत में बदल गया। इसी शहर में एक विश्वप्रसिद्ध होटल ऐसा भी है, जो अपने फल से लेकर सब्ज़ियाँ तक सबसे ऊपर बनाए गए फार्म हाउस में उगाता है। इसमें सेब से लेकर हरी-भरी सब्ज़ियाँ, हर्बल और शहद सबकी पैदावार होती है। इसके जरिए होटल हर साल सोलह हजार डॉलर से कहीं ज्यादा की बचत करने लगा है।

सैनफ्रांसिस्को में तमाम बस स्टाप की छोटी-छोटी छतें, लताओं और बेलों से गुथी हुई दिखेंगी और उन्हीं के बीच रंग-बिरंगे फूल। बस शेल्टर पर इन्हें बनाने का खास उद्देश्य था। ताकि यहां से जाने-आने वाले अपने घर को भी वैसा ही हरा-भरा करने का आइडिया यहां से लेकर जाएं। लंदन को दुनियाभर में बहुत परंपरागत शहर माना जाता है। अंग्रेज एक खास तरह के आर्किटेक्चर को पसंद करते हैं और उनमें रहना पसंद करते हैं। एकदम सीधी ऊंचाई वाले दो से तीन मंजिल वाले घर। सपाट खिड़कियों और छत के ऊपर चिमनियों वाले, लेकिन अब इस शहर में छतें अलग अंदाज़ में बनने लगी हैं, जिन पर छोटे लॉन्स और ऊर्जा संचय की खास ख्याल रखा जाने लगा है। दुनियाभर में प्रसिद्ध फोर्ड गाड़ियों का मुख्यालय है मिशिगन, जहां फोर्ड कंपनी का लंबा चौड़ा साम्राज्य फैला हुआ है। यहीं से वो दुनियाभर में अपने व्यापार को नियंत्रित करने का काम करते हैं। उनकी एक फ़ैक्टरी की 10.4 एकड़ की छत पर पहले धूप और ऊपर से गुजरने वाले विमानों का खासा असर पड़ता था। इससे निजात पाने के लिए उन्होंने इस लंबे क्षेत्र को हरे-भरे पार्क में बदल डाला। अब ये पार्क न केवल धूप से उन्हें बचाता है बल्कि पास के एयरपोर्ट पर रनऑफ के समय विमानों के शोरगुल और धुएं से फ़ैक्टरी की इस इमारत की रक्षा करता है।

कुछ पर्यावरणविद इसलिए इसे उपयोगी मानते हैं कि कम से कम इसी बहाने से तो शहरी लोग प्रकृति के फिर से करीब आने लगे हैं। यानी उनकी निगाह में ये प्रकृति का शहरीकरण है, जिससे भागमभाग वाली शहरी जीवनशैली में जिंदगी को आप प्रकृति के करीब महसूस करने लगते हैं। इसका फायदा तनाव घटाने से लेकर स्वाभाविक तौर पर सुकून देने में हो सकता है। छतों पर ग्रीन रूफ तैयार करने की प्रक्रिया में सबसे निचली लेयर हवायुक्त डेक की होती है। इसके ऊपर वाटरप्रूफ परत होती है, जिसके ऊपर खास तरह की स्टोरेज कपनुमा बैरियर मैट बिछाए जाते हैं, जो ऊपर से फैब्रिक फिल्टर से चिपके होते हैं। इतनी परतों को एक के ऊपर एक लगाने का मकसद ड्रेनेज सिस्टम तैयार करना होता है। जो पानी को फिल्टर करके सबसे नीचे के डैक्स तक लाता है और फिर इन्हें शुद्ध रूप में स्टोरेज टैंक्स में इकट्ठा कर लिया जाता है। ये ड्रेनेज सिस्टम केवल पानी को फिल्टर करने और नीचे स्टोरेज टंकियों तक ही पहुंचाने का काम नहीं करता बल्कि छत और मिट्टी के बीच इंसुलेटर का काम भी करता है। इतना कुछ करने के बाद फिल्टर फैब्रिक पर मिट्टी की सतह बिछाकर उस पर घास और पौधे बो दिए जाते हैं और इस तरह तैयार हो जाती है ग्रीन रूफ। रूप बैरियर मैट्स से लेकर मिट्टी के ऊपरी सतह तक की कुल ऊंचाई तीन से पंद्रह इंच तक हो सकती है। बेशक इस तरह की छतों की लागत आम छतों से दोगुनी से तिगुनी तक होती है, लेकिन लंबी अवधि में देखें तो ये न केवल खासी सस्ती साबित होती हैं बल्कि उपयोगी भी।

green roofये जीती-जागती छतें हमें नेचुरल बॉयोलॉजिकल सिस्टम के बारे में भी बताती हैं। भीषण गर्मी में कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुके शहरों के मकान किस तरह भट्ठी में तब्दील हो जाते हैं, ये हममें से किसी से छिपा नहीं है, लेकिन मिट्टी और वनस्पतियों से युक्त ये छतें सीधी धूप को रोककर अवरोधक का काम करती हैं। जाहिर सी बात है कि इससे बिल्डिंग का तापमान कम हो जाता है। इससे बिल्डिंग की कूलिंग कास्ट करीब बीस फीसदी तक कम हो जाती है। आमतौर पर जब बरसात का पानी खाली छतों पर गिरता है तो उसकी बर्बादी ही होती है, लेकिन सजीव छतें पानी को सोखती हैं, फिल्टर करती हैं और फिर इसे धीरे-धीरे नीचे की ओर निकालकर स्टोर कर देती हैं। इस प्रक्रिया से शहर के ड्रेनेज सिस्टम पर दबाव कम हो जाता है और इसकी जिंदगी बढ़ जाती है। जहां तक भारत की बात है तो भारत में ग्रीन रूफ्स या ग्रीन बिल्डिंग्स अभी दूर की कौड़ी लगती है। कुछ बड़े शहरों में इसकी पहल तो हो रही है लेकिन ये अभी न के बराबर है, लेकिन ये बात सही है कि अगर शहर इलाके की नई बिल्डिंग्स ग्रीन बिल्डिंग्स के कांसेप्ट को लागू करें तो भारत 3,400 मेगावाट बिजली बचा सकता है। एनर्जी एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट (टेरी) के प्रमुख नोबेल पुरस्कार विजेता आर.के. पचौरी कहते हैं अगर ऐसा हुआ तो अपना देश हर साल 40 हजार करोड़ रुपए तक की बचत कर सकता है। मिनिस्ट्री ऑफ न्यू एंड रेनेवेबल एनर्जी के सलाहकार डॉ. बी बंदोपाध्याय कहते हैं कि भारत में बड़े पैमाने पर ग्रीन बिल्डिंग्स बनाना संभव नहीं लेकिन बड़े संस्थान या सरकारी भवनों में ज़रूर ऐसा किया जा सकता है। वह कहते हैं कि बेशक ऐसे भवनों की लागत ज्यादा आती है, लेकिन कुछ ही सालों में अपने ऊर्जा बचत और वाटर हार्वेस्टिंग जैसे तरीकों से अपनी कीमत वसूल करा देते हैं। बेशक मुंबई और पुणे में ऐसी बिल्डिंग्स की शुरुआत हुई है। छोटे स्तर पर लोगों ने ग्रीन रूफ की ओर ध्यान देना भी शुरू किया है।

क्यों चाहिए हरी-भरी छतें और बिल्डिंग्स?


भारत दुनिया का पांचवा बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है।
देश बड़े पैमाने पर बिजली संकट का सामना कर रहा है, जो समय आने के साथ और बढ़ेगा।
पानी के स्रोत भी अक्षय नहीं हैं। पानी के स्रोत सीमित हैं, लेकिन जनसंख्या तेजी से कई गुना हो चुक है। वर्ल्ड बैंक का आकलन है कि अगले दो दशकों में भारत ने अगर पानी प्रबंधन के लिए गंभीर पहल नहीं की तो गहरा संकट पैदा हो जाएगा।
हमारे बड़े शहरों में वायु प्रदूषण भी एक बड़ी समस्या है।
बड़े शहरों में ज़मीन खत्म हो चुकी है। पार्क गिने-चुने हैं। लोगों को कंक्रीट के जंगल में ताजी हवा तक नसीब नहीं।
बरसात का पानी व्यर्थ चला जाता है। हम इसका कोई उपयोग नहीं कर पाते।

क्या होना चाहिए?


देश में ग्रीन नार्म्स का पालन खासकर नई बिल्डिंग्स में अनिवार्य कर देना चाहिए। यानी ने भवन ग्रीन हों और उनकी छतों पर लॉन या पार्क विकसित किए जाएं। ऊंची इमारतों में इसका पालन एकदम अनिवार्य कर देना चाहिए।
ये देखना चाहिए कि क्या हम अपनी विशालकाय इमारतों की खाली छतों का उपयोग ग्रीन बनाने में कर सकते हैं या नहीं।
बड़े भवनों, कॉमर्शियल बिल्डिंग्स और कॉर्पोरेट हाउसेस के लिए ग्रीन टेक्नोलॉजी का उपयोग अनिवार्य हो जाना चाहिए। इनमें वाटर हार्वेस्टिंग सोलर एनर्जी जेनरेशन की व्यवस्था होनी चाहिए।
अगर कोई ग्रीन बिल्डिंग बनाता है या ग्रीन रूफ्स विकसित करता है तो टैक्स छूट के जरिए उसे सरकार को राहत की व्यवस्था करनी चाहिए।
बड़े बिल्डर्स के लिए नई परियोजनाओं में कुछ हद तक इसके पालन को अनिवार्य किया जाना चाहिए।

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