उपसंहार

Author:डॉ. दिनेश कुमार मिश्र
Source:डॉ. दिनेश कुमार मिश्र की पुस्तक 'दुइ पाटन के बीच में'
तटबन्धों के अन्दर जो जिन्दा रहने की परिस्थितियाँ हैं उन पर किसी भी आधुनिक सभ्य समाज को शर्म आनी चाहिये क्योंकि यह लोग उन सारी नागरिक सहूलियतों से महरूम हैं जिन्हें विकास का पैमाना माना जाता है। वहाँ पर लाखों लोग किस तरह से पचासों साल से जिल्लत की जिन्दगी जी रहे हैं, इस बात को दुर्भाग्यवश बाहरी दुनियाँ की बात कौन करे-बिहार के अन्दर भी लोग नहीं जानते। वह वहाँ अविश्वसनीय परिस्थितियों में जिन्दगी बसर कर रहे हैं और उनकी दशा में सुधार के लिए शीघ्र ही कुछ करने की जरूरत है। समाज को और देश को यह नहीं भूलना चाहिये कि दूसरे लोगों का बाढ़ से बचाव हो सके, इसके लिए इन लोगों ने अपने हितों की कुर्बानी दे दी थी। यह एक अलग बात है कि बाढ़ से इस तरह का बचाव न तो संभव था और न वांछनीय और न यह हासिल ही किया जा सका लेकिन इतना तो तय है कि करीब दस लाख लोग तो कोसी तटबन्धों के बीच फंस कर बरबाद हो ही गये।

बहुत से इंजीनियर यह दलील देते हैं कि तटबन्धों के निर्माण से फसल की क्षति रुकी है और इस बढ़े कृषि उत्पादन की लागत को अगर आंका जाय तो निश्चित रूप से कोसी परियोजना पर जो निवेश किया गया था वह सूद समेत वापस मिल गया है और इस योजना से बेशक लाभ हुआ है। सहरसा, पूर्णियाँ जैसी जगहों में जमीन का दाम बढ़ा है, नये शहर आबाद हुये हैं और वह जगहें जो कभी काला पानी के नाम से मशहूर थीं, वहाँ खुशहाली लौटी है।

यह एक शुद्ध तकनीकी वक्तव्य है और जब बढ़ी हुई फसल की कीमत लगाई जाती है तब कीमत इस बात की भी लगाई जानी चाहिए कि तटबन्धों के अन्दर लगभग सवा लाख हेक्टेयर के आस पास जमीन हमेशा-हमेशा के लिए बरबाद हुई। जितनी जमीन की बाढ़ से रक्षा करने की योजना थी उससे लगभग दुगुनी जमीन जल-जमाव, बालू जमाव और नदी के कटाव की भेंट चढ़ गई। तटबन्धों के भीतर के 380 गांव आदिम परिस्थितियों में जीने के लिए अभिशप्त हुये और तटबन्धों के बाहर कितने गांव जल-जमाव में ठिकाने लग गये उनका कोई हिसाब नहीं है। इन जमीनों पर लगे बाग-बगीचे खत्म हो गये, पशु-धन नष्ट हो गया, वन्य-प्राणी समाप्त हो गये और यहाँ की जनता का दरजा एक सम्मानजनक नागरिक से घट कर रिलीफखोर का हो गया।

सबसे बड़ा नुकसान जो हुआ वह यह कि नदी आसमान चढ़ गई और अब वह पानी की निकासी करने के बजाय उसे फैलाने का काम करती है। यह क्षति अपूरणीय है और इसे कितना भी पैसा खर्च किया जाय, ठीक नहीं किया जा सकता। जब योजना से नफे-नुकसान की बात उठती है तो इन सारी लागतों को ध्यान में रख कर ही बात करनी चाहिये।