वेल्लौर, तमिलनाडु में शून्य अपशिष्ट प्रबंधन

Author:संपादक
Source:यूएनडीपी
शहरीकरण से संपन्नता तो आती है, पर यह अपने साथ पर्यावरणीय समस्यांए भी लाता है, यथा- प्रदूषण, ठोस अपशिष्ट का जमाव और सफाई एवं स्वच्छता का अभाव। टेट्रापैक, प्लास्टिक के प्लेट, कप और थैले, टिन-कनस्तर और ऐसी ही फेंक दी जाने वाली चीजों का उपयोग पिछले दशक में काफी बढ़ा है। इसी तरह जैविक अपशिष्ट में भी काफी बढ़ोतरी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी शहरी क्षेत्रों की तरह ठोस अपशिष्ट का सृजन बढ़ रहा है। शहरी एवं ग्रामीण-दोनों ही क्षेत्रों में अपशिष्ट के उचित संग्रहण का अभाव, उनका पृथक्कीकरण, प्रबंधन की प्रणाली और स्वच्छता एवं सफाई की खराब स्थिति आदि सबके कारण स्वास्थ्य समस्य़ाएं बढ़ रही हैं। इस संदर्भ में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन एक चुनौती भरा क्षेत्र है और इसमें योजना बनाने वालों और नगर निगमों के लिए नये प्रयोगों की अपेक्षा है। अपनी अलग धारणीयता (धारण करने की क्षमता) और सफलता की कोटि (श्रेणी) के साथ बहुत सारी छोटी एवं बड़ी मार्गदर्शी योजनाएं इस देश के बहुत सारे भागों में काम कर रही हैं। तमिलनाडु के वेल्लौर जिला में यूनीसेफ द्वारा प्रारंभ की गयी और अब एक गैर सरकारी संगठन ‘एक्सनोरा ग्रीन क्रास´ और जिला ग्रामीण विकास अभिकरण द्वारा प्रवर्ति्त ‘शून्य अपशिष्ट प्रबंधन´ एक सफल ठोस अपशिष्ट प्रबंधन कार्यक्रम और इससे होने वाले लाभ का ज्वलंत उदाहरण है।



‘शून्य अपशिष्ट प्रबंधन´ एक ऐसी प्रणाली है, जिसके अंतर्गत पुनर्चक्रण एवं पुनर्प्रयोग के द्वारा अपशिष्ट का अधिकतम दोहन इस प्रकार किया जाता है, जिससे वास्तविक रुप से अपशिष्ट का सृजन शून्यस्तर पर हो।

• इस प्रणाली में मुख्य बल इस बात पर दिया जाता है कि स्त्रोत स्थल पर ही अपशिष्ट का पृथक्कीकरण कर दिया जाए जिससे संसाधनों का अधिकतम दोहन हो सके, अपशिष्ट न्यूनतम हो और भंडारण तथा कंपोस्ट बनाने के लिए आवश्यक क्षेत्र में कमी हो सके।
• क्षेपण-भूमि (डम्प साइट) और भू-भराई में अपशिष्ट का निष्पादन नहीं करने से भूतल-जल और वायु के प्रदूषण में बहुत कमी आ जाती है।
• शून्य अपशिष्ट प्रबंधन में अनौपचारिक पुनर्चक्रण सेक्टर एकीकृत हो जाता है। इसके अतर्गत चिथड़ा चुनने वाले और अन्य प्रकार के अपशिष्टों के संग्रहकर्ता आते हैं। इस प्रकार इसमें अपशिष्ट प्रबंधन के सभी कारक एक साथ हो जाते हैं। इससे आय-सृजन के अवसर भी बढ़ते हैं।


सन् 2000 में वेल्लौर नगर पालिका के वार्ड में ‘एक्सनोरा ग्रीन क्रास´ ने युनीसेफ के सर्मथन से ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए एक मार्गदर्शी योजना (पायलट प्रोजेक्ट) प्रारंभ की। पुनः 2002 में ‘संपूर्ण स्वच्छता अभियान´ के अंतर्गत यह परियोजना ‘कानियाम्पाडी´ प्रखंड के ग्रामीण इलाकों में चालू की गयी। यह योजना इन चार गांवों में लागू की गयीः पलवांचाट, सलेमानाथम, विरुपाक्षिपुरम्, कामवनेपेट, इनके उदे्दश्य निम्न रुप रखे गयेः

• पर्यावरण के अनुकूल अपशिष्ट प्रबंधन जिसमें मुख्यतः स्त्रोत पर पृथक्कीकरण एवं पुनर्चक्रण पर विशेष बल देकर लोगो में चेतना जागृत करना।
• स्थानीय समुदायों को संगठित करना और जन भागीदारी द्वारा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का विकेंद्रीकरण करना।
• ग्रामीण युवजन के लिए सूक्ष्म उद्यमों के लिए अवसर प्रदान कर अपशिष्ट से संपदा का सृजन।


एक्सनोरा ग्रीन क्रास ने तकनीकी निवेश प्रदान किया और स्थानीय आवासी संगठनों एवं स्वयं सहायता समूहों के साथ मिलकर परियोजना के क्रियान्वयन में मार्गदर्शन किया। जिला ग्रामीण विकास अभिकरण ने छप्पर (शेड) निर्माण, तिपहिया साइकिल की खरीद और औजार आदि की खरीद के लिए राशि (निधि) प्रदान की और स्थानीय संस्थाओं के समर्थन के लिए आश्वस्त किया। प्रत्येक ग्राम-पंचायत के लिए एक परियोजना दल बनाया गया. जिसमे एक समन्वयक, पर्यवेक्षक और वीथी-सुन्दरक (स्ट्रीट व्यूटीफायरस) रखे गये। ग्रामवासियों एवं दुकानदारों की एक जनसभा आयोजित की गयी, जिसमें ‘शून्य अपशिष्ट प्रबंधन´ एवं पृथक्कीकरण के लिए अपशिष्ट की पहचान विषय को समझाया गया। अपशिष्ट के वर्गीकरण पर पम्फलेट बांटे गये और वीडियो शो दिखाए गए। प्रत्येक परिवार को लाल एवं हरे ‘डस्ट बिन´ का एक सेट दिया गया। वीथी सुन्दरकों को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के सभी पहलुओं पर प्रशिक्षित किया गया। दो वीथी-सुन्दरको से युक्त कई दल बनाए गए। ऐसे प्रत्येक दल को 300 परिवार आबंटित किए गए और प्रत्येक को एक तिपहिया साइकिल में दो खंड थेः एक हरा, दूसरा लाल। हरे में जैविक और लाल में अजैविक अपशिष्ट का संग्रहण होता था।

वीथी-सुंदरक 7 बजे पूर्वाह्व से 11 बजे पूर्वाह्न के बीच अपने अपने आबंटित परिक्षेत्र में घरेलू कूड़े का संग्रहण करते है। घर परिवारों से हरे और लाल ‘डस्टबीनों´ में संग्रहित अपशिष्ट को तदनुरुप रंग वाले तिपहिया साइकिल के उपखंडों में रखकर उसे ‘शून्य अपशिष्ट केंद्र´ पर ले जाया जाता है। अजैविक अपशिष्ट को 25 से अधिक वस्तु-प्रकारों में अलग-अलग किया जाता है, यथा- बोतल, प्लास्टिक, धातु, कार्डबोर्ड, कागज, पीवीसी इत्यादि। प्रतिमाह इनकी पैकींग की जाती है और इन्हें पुनर्चक्रण नहीं किया जाता है। 10-15 प्रतिशत मिश्रित अपशिष्ट जिसका पुनर्चक्रण नहीं किया जा सकता है- को भू- भराई के लिए भेज दिया जाता है। जैविक अपशिष्ट का दो तरह से कंपोस्ट बनाया जाता है और उपचारित किया जाता हैः (1) गोबर कंपोस्ट (2) कृमि कंपोस्ट।

गोबर का कंपोस्ट बनाने के लिए कंपोस्ट-प्रांगण के बड़े खंडों में जैविक अपशिष्ट को कई तहों में बिछा दिया जाता है। प्रत्येक तह को कतारों में सूक्ष्म जीवाणुयुक्त गोबर से उपचारित किया जाता है। जब एक तह की उंचाई 5 फीट हो जाती है, इसे पोलीथीन शीट से ढंक दिया जाता है। कंपोस्ट बनाने के इस प्रथम चरण में 45 दिन लगते हैं। पोलीथीन शीट वातनिरपेक्ष कंपोस्ट बनने की प्रक्रिया में सृजित ताप को रोक रखता है और आंतरिक ताप को 70-75 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा देता है। यह उच्च तापमान पैथोजेन (रोगाणुओं) को मार डालता है। आर्द्रता का वाष्पीकरण हो जाता है और पोलीथीन के नीचे में घनीभूत हो जाता है। जल की चक्राकर गति के साथ जीवाणुओं का भी चक्रण होता रहता है, जिससे अपघटन की गति तीव्र होती है और 15 दिनों के भीतर आयतन में करीब एक तिहाई का ह्रास होता है। 50 दिनों के बाद कंपोस्ट को निकाला जा सकता है, चाला जा सकता है। दूसरी पद्धति के अंतर्गत अर्द्धअपघटित जैविक अपशिष्ट को 15 दिनों के बाद कृमि कंपोस्ट तलों पर रखा जाता है। 45 दिनों के बाद कृमि कंपोस्ट का संग्रहण किया जा सकता है। उर्वर कंपोस्ट खाद को चाल लिया जाता है और कृषि तथा वृक्षारोपण कार्य के लिए उसकी बोराबंदी कर ली जाती है।

वेल्लौर ठोस अपशिष्ट प्रबंधन परियोजना का प्रबंधन अब ग्रामपंचायतों के द्वारा किया जाता है। आवासीय कल्याण संगठनों एवं स्वयं सहायता समूहों द्वारा इन्हें बल प्रदान किया जाता है। प्रत्येक परिवार बीस रुपये और प्रत्येक दुकान 50 रुपये का भुगतान अपशिष्ट संग्रहण शुल्क के रुप में करता है। इस प्रकार मासिक शुल्क (चंदा) और अजैविक अपशिष्ट एवं जैविक खाद की बिक्री से प्राप्त राशि से जो निधि बनती है, उसका उपयोग वीथी सुंदरकों एवं पर्यवेक्षकों को भुगतान के लिए किया जाता है। वित्तीय वर्ष 2005-06 में गांधी नगर ग्राम पंचायत ने जैविक अपशिष्ट की बिक्री से 10,646/- रूपए और अजैविक अपशिष्ट के विक्रय से कुल 1,62,289/- रूपये की आय प्राप्त की। वेल्लौर जिला में मार्गदर्शी योजनाएं सफल रही हैं। इस क्रिया विधि में स्थानीय युवजनों द्वारा पर्यावरण स्वच्छ रखा जाता है। ये युवाजन आत्मगौरव से परिपूर्ण होकर सड़कों एवं गलियों को स्वच्छ एवं सुंदर बनाते हैं और बदले में इन्हें पारश्रमिक / मानदेय भी मिल जाता है। इस शानदार सफलता में स्थानीय निकायों की सक्रिय भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है, जिनकी प्रतिबद्धता ने इसे एक अलग रूप दिया है।

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