विकास के केंद्र में नहीं पहाड़ी समाज

Author:पुरुषोत्तम शर्मा
Source:उत्तराखण्ड आज, जुलाई 2016

.16-17 जून 2013 को उत्तराखण्ड में आई विनाशकारी आपदा के बाद इस साल पिथौरागढ़ के बस्तड़ी और चमोली जिले के घाट क्षेत्र में हुए जान-माल के भारी नुकसान ने साबित कर दिया है कि हमारी सरकारें घटनाओं-दुर्घटनाओं से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं हैं। हालाँकि बादल का फटना पहाड़ में सामान्य घटना है और इसे रोक पाना शायद किसी भी सरकार के लिये संभव नहीं है किंतु सरकारें जान-माल के न्यूनतम नुकसान की कोशिशें तो कर सकती हैं। पूरे उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र की बसावटों का भूगर्भीय और भूस्खलन के लिये संवेदनशीलता का सर्वे कराना और उस लिहाज से जहाँ जरूरी हो आबादी के पुनर्वास की योजना बनाना तो सरकार के हाथ में है। राज्य व केंद्र सरकार के यह भी है कि वह मौसम के पूर्वानुमान के लिये आधुनिक तकनीक का न्याय पंचायत स्तर तक व्यापक प्रयोग करती और सायरन सिस्टम के जरिये लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों की ओर जाने के लिये चेतावनी देती, किंतु हमारी राज्य व केंद्र सरकार के एजेंडे में यह सवाल है ही नहीं। बाढ़, भूस्खलन, सूखा और आग से जान-माल का नुकसान हमारे सत्ताधारियों, नौकरशाहों को उद्वेलित नहीं करता है, बल्कि इस पर नई कमाई की उम्मीदें उनको नए जोड़-घटाने की कसरत में लगा देती है। उत्तराखण्ड में इन सोलह सालों में सत्तासीन कांग्रेस-भाजपा की हर सरकार इसी रास्ते पर चलती रही है।

उत्तराखण्ड में हर आपदा के बाद पहाड़ पर विकास के मॉडल और इको-सिस्टम (पारिस्थितिकीय तंत्र) से छेड़छाड़ पर बहस तेज हो जाती है। इस सवाल पर सारी बहसों को अंततः उत्तराखण्ड में ‘इको सेंसिटिव जोन’ बनाने के समर्थन में ले जाया जाता है। पर्यावरणविदों के अलावा भी जल, जंगल, जमीन पर जनता के परम्परागत अधिकारों की वकालत करने वाले कई संगठन व लोग भी इसके समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं। बहसें यहीं तक नहीं रुकती हैं, पहाड़ में वर्तमान विद्युत परियोजनाओं के समर्थक भी इस तबाही को रोकने के लिये और भी बड़े पैमाने पर बाँधों व सुरंगों के जरिये नदियों के वेग को रोकने की खुलकर वकालत करते हैं किंतु इन सारी बहसों के बीच पहाड़ का वो मानव समाज और उसकी चिंताएं कहीं दूर तक भी नजर नहीं आ रही हैं जो हजारों वर्षों से इस पहाड़ को, यहाँ के इको-सिस्टम को और यहाँ की आत्मनिर्भर स्थानीय अर्थव्यवस्था को बचाता आया है।

हजारों वर्षों से कृषि, पशुपालन और ग्रामीण दस्तकारी पर आधारित पहाड़ की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार वन रहे हैं, इसलिये पहाड़ के लोगों ने हजारों वर्षों से न सिर्फ वनों को लगाया और उनकी रक्षा की बल्कि इको-सिस्टम को समझते हुए अपने रहन-सहन और आजीविका के साधनों का विकास किया। पहाड़ के गाँवों की बनावट को अगर देखें तो हर गाँव में ऊपर जंगल, जंगल के नीचे आबादी, आबादी के नीचे खेती, खेती के नीचे नदी। अर्थात किसी भी गाँव की आबादी नदी से सटी नहीं है क्योंकि अपने अनुभव से उन्होंने नदी तट को आबादी के लिये सुरक्षित नहीं माना था। पहाड़ के गाँवों में कहावत है कि नदी और खेत की मेड़ बारह वर्ष में अपनी पुरानी जगह पर आ जाती है। नदी को लेकर पहाड़ के ग्रामीणों के इस परम्परागत ज्ञान को वर्तमान आपदा ने पूरी तरह सही साबित कर दिखाया है।

यही नहीं पहाड़ के लोगों ने अपने पानी के स्रोतों को बचाए रखने और चोटियों पर अपने पालतू व जंगली जानवरों को पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिये चाल-खाल (छोटे-छोटे तालाब) बनाने की एक पद्धति विकसित की, जिसमें बरसात का पानी जमा होता था और वह भूगर्भीय जल को बढ़ाने का काम करता था। आज भी हल-बैल पर निर्भर पहाड़ की खेती वनों पर निर्भर है, जहाँ पशुपालन से लेकर कृषि यंत्रों तक निर्भरता वनों पर रहती है। चूँकि वन पहाड़ के लोगों के जीवन का अभिन्न अंग हैं इसलिये एकमात्र उत्तराखण्ड के पहाड़ ही हैं जहाँ सरकारी वनों से परम्परागत अधिकार छिन जाने के बाद लगभग 16000 राजस्वगाँव वाले राज्य की जनता ने 12000 से ज्यादा गाँवों में वन पंचायतें गठित कर सरकारी वनों से इतर अपने खुद के वनों का निर्माण किया है।

आज जो सरकारें और लोग ऊर्जा की जरूरतों का हवाला देकर पहाड़ की नदी घाटियों को जेपी, रेड्डी, एलएनटी, एनटीपीसी आदि के हवाले करने व बिजली उत्पादन के नाम पर पहाड़ों व नदियों से उन्हें मनमानी करने की छूट देने की वकालत करते नहीं थकते हैं उन्हें यह याद रखना चाहिये कि जब बिजली का आविष्कार नहीं हुआ था तब पहाड़ के लोगों ने आज से एक हजार साल पहले घट (पनचक्की) का आविष्कार कर पानी से ऊर्जा उत्पन्न करने की विधि खोज ली थी। यह विधि नदी और पहाड़ों को छेड़े बिना ही रन-वे-रिवर पद्धति से सफल हुई थी। तब पहाड़ के लोगों को यह विधि सिखाने के लिये किसी जेपी, रेड्डी, एलएनटी, एनटीपीसी को लाने की जरूरत नहीं पड़ी थी। यह इको-सिस्टम को क्षति पहुँचाए बिना विकास करने का पहाड़ के लोगों का सिंचित परम्परागत ज्ञान था। आज सुरंगों पर आधारित जिन बड़ी-बड़ी विनाशकारी परियोजनाओं को ये कंपनियाँ बना रही हैं वो रन-वे-रिवर पद्धति नहीं कहलाती हैं।

पहाड़ के लोगों के इस सिंचित परम्परागत ज्ञान के आधार पर यहाँ की कृषि, पशुपालन और ग्रामीण दस्तकारी के साथ ही पनचक्की के लिये विकसित की गई रन-वे-रिवर पद्धति को ऊर्जा की अन्य जरूरतों के लिये विकसित कर यहाँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता था किंतु पहले अंग्रेजों और बाद में आजाद भारत के शासकों ने उत्तराखण्ड की इस विकसित होती आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त करने का षडयंत्र किया। अंग्रेजों ने उत्तराखण्ड के इस पर्वतीय क्षेत्र को वन आधारित कच्चे माल व सस्ते श्रम के लिये इस्तेमाल किया। तब न सिर्फ फैलते रेल लाइनों के जाल के लिये पहाड़ के जंगलों को बड़े पैमाने पर काटा गया बल्कि सर्दियों में आग सेंकने के लिये पहाड़ के परम्परागत पेड़ों को काट कर उसका कोयला बनाया गया।

. सन 1975 आते-आते शासक वर्ग की जरूरतें बदलने लगी थी। देश के शहरी केन्द्रों को अब सस्ते श्रम की जगह पर्याप्त बिजली व स्वच्छ पानी की जरूरतों से जूझना पड़ रहा था, वहीं विकसित राष्ट्रों द्वारा ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के चलते दुनियाँ के स्तर पर पर्यावरण संरक्षण एक प्रमुख एजेंडा बन कर सामने आ गया। ऐसे में उत्तराखण्ड के इस पर्वतीय भूभाग को बिजली, स्वच्छ पानी तथा पर्यावरण व जैव विविधता के संरक्षण के लिये रिजर्व जोन में तब्दील करने की रणनीति पर शासक वर्ग आगे बढ़ने लगा, किंतु यह तभी संभव था जब यहाँ की परम्परागत आर्थिकी के आधार को खत्म किया जाता, इसलिये शासक वर्ग ने जानबूझ कर यहाँ की कृषि, पशुपालन व ग्रामीण दस्तकारी को हतोत्साहित करने की नीति का अनुसरण कर लोगों को यहाँ से पलायन के लिये मजबूर किया। आज उत्तराखण्ड के उच्च हिमालयी क्षेत्र के गाँवों में ही युवाओं को देखा जा सकता है। उन क्षेत्रों में पशुपालन और कृषि पर आधारित उनकी परम्परागत आजीविका के आधार का मजबूत होना इसका मुख्य कारण है। चीन व नेपाल सीमा से जु़ड़े धारचूला, मुनस्यारी, जोशीमठ, ऊखीमठ, भटवाड़ी और रवाई ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ बड़ी तादाद में युवा आज भी गाँवों में टिका है, बाकी पहाड़ पलायन की मार से त्रस्त है।

राज्य बनने के बाद जल, जंगल, जमीन पर स्थानीय निवासियों के परम्परागत अधिकार बहाल करने और पारिस्थितिकीय तंत्र से ज्यादा छेड़छाड़ किये बिना विकास का वैकल्पिक ढाँचा खड़ा करने की जो जिम्मेदारी राज्य के नए नेतृत्व के जिम्मे थी, वह अपनी वर्गीय प्रतिबद्धता के चलते भाजपा-कांग्रेस की सरकारों के रूप में उसके ठीक विपरीत रास्ता चुनती गई। राज्य की आर्थिकी को मजबूत आधार देने के नाम पर ऊर्जा प्रदेश और पर्यटन प्रदेश के नारे गूँजने लगे। विद्युत कम्पनियों की बड़ी-बड़ी मशीनों के निर्बाध आवागमन के लिये सड़कों को चौड़ा कर इन सड़कों और सुरंगों का सारा मलवा पेड़ों सहित नदियों में उड़ेल दिया गया। राज्य में राजस्व वसूली के बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये शराब के व्यवसाय को मुख्य व्यवसाय का दर्जा दे दिया गया। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद और प्रति व्यक्ति औसत आय को बढ़ाने के नाम पर जमीनों और खनन की लूट का कारोबार पनपाया गया।

नतीजे के तौर पर नदी घाटियों पर विद्युत कम्पनियों और खनन माफिया का कब्जा और मनमानी बढ़ती गई। पर्यटन व्यवसाय के नाम पर और ‘इको टूरिज्म’ को बढ़ावा देने के नाम पर सड़कों, नदी-घाटों और जंगलों पर सत्ता के संरक्षण में कब्जा करने की होड़ में कांग्रेस, भाजपा, बसपा, यूकेडी और सपा जैसी कोई भी पार्टी पीछे नहीं रही। अब तक राज्य में विद्युत कम्पनियाँ 1700 वर्ग किमी. जंगल साफ कर चुकी हैं। विभिन्न योजनाओं के लिये राज्य सरकार लगभग 20 हजार वर्ग किमी वन भूमि को हस्तांतरित कर चुकी है, किन्तु इसके बदले दोगुने क्षेत्र में वृक्षारोपण की अनिवार्य शर्त को खानापूरी के लिये दूसरे राज्यों में दर्शाकर आवंटित धन की जमकर लूट की गई। गंगा नदी के सौ मीटर बाहर तक कोई निर्माण न करने के माननीय सुप्रीम कोर्ट के 2013 के आदेश के बावजूद हरिद्वार से लेकर गंगोत्री-केदारनाथ तक गंगा व अन्य नदियों के जल को छूते हुए होटल व्यवसायियों, धार्मिक संस्थाओं और सरकारी विभागों द्वारा भवन निर्माण अब तक बेरोक-टोक जारी हैं।

राज्य सरकार को हैलीपैडों के इस्तेमाल का कोई भी शुल्क दिये बिना यात्रा सीजन में निजी कम्पनियों के हैलीकॉप्टर रोजाना चार हजार चक्कर उच्च हिमालयी क्षेत्रों का लगा रहे थे, जिन पर रोक लगाने के आदेश 10 मई 2013 को माननीय हाईकोर्ट ने दे दिये थे, किन्तु इन हैली सेवाओं को रोकने के बजाए राज्य सरकार ने इनका विस्तार ही किया है। सत्ता द्वारा, सत्ता के संरक्षण में इको-सिस्टम के साथ खुलेआम किये जा रहे इस विनाशकारी व्यवहार ने ही पहाड़ के इको-सिस्टम को भारी नुकसान पहुँचाया है। इसी का खामियाजा 16-17 जून की विनाशकारी आपदा से लेकर इस साल के घाट व बस्तड़ी घटना के रूप में हमें भुगतने को मजबूर होना पड़ा। पहाड़ के जीवन में अति मुनाफे के लिये जब तक यह बाहरी हस्तक्षेप नहीं था। तब तक यहाँ के इको-सिस्टम को कोई नुकसान नहीं पहुँचा था, किन्तु अब अति मुनाफे पर खड़ी प्रकृति के लिये विनाशकारी यह राजनीति ‘इको-सेंसिटिव जोन’ के माध्यम से उन पर्वतवासियों को विस्थापन की सजा दे रही है जो हजारों वर्षों से इस इको-सिस्टम के मजबूत पहरेदार रहे हैं।

‘इको सेंसिटिव जोन’ इनकी परम्परागत आजीविका पर एक बड़ा हमला है जो इन दुर्गम क्षेत्रों के नौजवानों को भी पलायन के लिये मजबूर कर देगा। इको-सिस्टम को बचाए रखने और जैव-विविधता की रक्षा के नाम पर उत्तराखण्ड के एक बड़े भू-भाग को ‘इको सेंसिटिव जोन’ में तब्दील करने का षडयंत्र चल रहा है। इसके पहले चरण में 18 दिसम्बर 2012 से गंगोत्री से उत्तरकाशी तक के एक सौ किमी. क्षेत्र को ‘इको सेंसिटिव जोन’ घोषित किया जा चुका है। केन्द्र सरकार ने सभी राष्ट्रीय पार्कों और सेंचुरीज के दस किमी. बाहरी क्षेत्र को ‘इको सेंसिटिव जोन’ घोषित करने का निर्णय लिया है। उत्तराखण्ड में पहले से चौदह राष्ट्रीय पार्क और सेंचुरीज मौजूद थे। बावजूद इसके राज्य सरकार ने इनकी संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव भेज कर वर्ष 2013 में तीन नये सेंचुरीज क्षेत्रों को स्वीकृति दिला दी।

पहले ही इन राष्ट्रीय पार्कों व सेंचुरीज की सीमा में आए राज्य के हजारों गाँवों पर विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है, ऐसे में अगर इनके दस किमी बाहरी क्षेत्र को ‘इको सेंसिटिव जोन’ घोषित कर दिया गया तो उत्तराखण्ड की आबादी के एक बड़े हिस्से को विस्थापन के लिये मजबूर कर दिया जाएगा। राज्य में ‘इको सेंसिटिव जोन’ का भारी विरोध देख सत्ताधारी कांग्रेस और भाजपा ने भी इसका विरोध किया। इन दोनों पार्टियों का विरोध सिर्फ दिखावा है। सच तो यह है कि ‘इको सेंसिटिव जोन’ के गठन का निर्णय एनडीए सरकार ने 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेई की अध्यक्षता में हुई बैठक में लिया था। इसी तरह 18 दिसम्बर 2012 को उत्तरकाशी में ‘इको सेंसिटिव जोन’ के गठन का निर्णय हो जाने के बाद भी न तो राज्य की कांग्रेस सरकार ने इसके खिलाफ कोई कदम उठाया और न ही पूर्व में भेजे गये नये सेंचुरीज के प्रस्तावों को ही वापस लेने की कोई पहल की।

अगर राज्य में निर्धारित सभी क्षेत्रों को इको सेंसिटिव जोन बना दिया गया तो वहाँ के निवासियों का जीना मुश्किल हो जाएगा। वनों पर निर्भर उनकी परम्परागत आजीविका के साधन पशुपालन और खेती छोड़ने के लिये उन्हें मजबूर कर दिया जाएगा, लघु वन उत्पाद जो उनका परम्परागत वनाधिकार है, से वे वंचित हो जाएंगे। वे अपनी आबादी का विस्तार नहीं कर पाएंगे और पुराने घरों का पुनर्निर्माण करने के लिये वन पर्यावरण मंत्रालय से इजाजत लेनी होगी। जबकि पूँजीपतियों को होटल व कॉटेज बनाकर अपना व्यवसाय करने की इजाजत होगी। बात साफ है कि सरकार ‘इको सेंसिटिव जोन’ के नाम पर इको-सिस्टम को नुकसान पहुँचाने वाली ताकतों के व्यावसायिक हितों की रक्षा के लिये स्थानीय जनता को उनकी जमीनों व परम्परागत आजीविका से बेदखल करना चाहती है।

राज्य बनने के बाद सत्ताधारी कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने योजनाबद्ध तरीके से उत्तराखण्ड में बचे इको-सिस्टम के बदले राज्य को ग्रीन बोनस देने की माँग शुरू कर दी थी। भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने तो आगे बढ़कर हिमालयी राज्यों की बैठक कराने और राज्य को प्रतिवर्ष चालीस हजार करोड़ रुपये ग्रीन बोनस के रूप में देने की माँग कर डाली। तब यह राशि राज्य के कुल सालाना बजट का दोगुना से भी ज्यादा थी। इस अभियान में वर्तमान मुख्यमंत्री से लेकर कई पर्यावरणविद तथा एनजीओ भी लगे हैं। एनजीओ ने हिमालयी राज्यों का अपना एक नेटवर्क भी स्थापित कर दिया है। दरअसल ग्रीन बोनस के नाम पर यह पूरा अभियान जो पिछले बारह वर्षों से उत्तराखण्ड में चलाया जा रहा है वह ‘इको सेंसिटिव जोन’ के निर्माण के लिये वातावरण तैयार करने के अभियान का ही हिस्सा था जो साम्राज्यवादियों और उनकी हितपोषक फंडिंग एजेंसियों द्वारा वित्त पोषित था।

अंधाधुंध विकास से खतरे में हिमालयहिमालय और उसके इको-सिस्टम को हजारों वर्षों से संरक्षित रखने वाले लोगों को उनकी जमीनों और परम्परागत आजीविका से बेदखल कर आखिर यह ग्रीन बोनस किसके लिये मांगा जा रहा है? पहाड़ में 17 सौ वर्ग किमी. वन क्षेत्र को नष्ट करने वाली जल विद्युत परियोजनाओं को चलाने वाली कम्पनियों को बिना कार्बन उत्सर्जन के विद्युत उत्पादन के लिये लाखों रूपये ग्रीन बोनस के रूप में अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ दे रही हैं, क्या वे इसकी हकदार हैं? मगर 12 हजार से ज्यादा जंगल वन पंचायतों के माध्यम से तैयार कर हिमालय और उसके पर्यावरण की रक्षा कर इन नदियों को बचाने वाले पहाड़ के ग्रामीणों की वन पंचायतों को आज तक किसी एजेंसी ने कोई ग्रीन बोनस नहीं दिया है। इससे साफ हो जाता है कि ग्रीन बोनस की यह राजनीति किसके हित में की जा रही है।

(लेखक अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव और ‘विपल्वी किसान संदेश’ पत्रिका के सम्पादक हैं)