विकास की सोचिए

Author:लीलाधर जगूड़ी
Source:अमर उजाला, 08 अक्टूबर 2010

अभिमत

इस समय उत्तराखंड कुछ जोगियों और संन्यासियों से त्रस्त दिख रहा है, जबकि इन्हें मनुष्यों के त्रास निवारण के भौतिक उपायों के बारे में सोचना चाहिए। जोगी और संन्यासी शब्द में अर्थ का बहुत बड़ा अंतर है। जोगी का संबंध ‘योग’ से है, जबकि संन्यासी का संबंध संसार से असंपृक्तता और वैराग्य से। लेकिन दोनों के आजकल घोर राजनीतिकरण और संसार से अधिकतम संलिप्तता वाले संबंध उजागर हो रहे हैं। हिंदू धर्म में संन्यासी के जो आचरण और कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं, उनके अनुसार उन्हें गृहस्थों के बीच और निकट निवास नहीं करना चाहिए। एकांतवास और कुटिया बनाकर रहना उनके आचरण का प्रमुख हिस्सा है। वे पक्की गुफा में तो रह सकते हैं, लेकिन मानव निर्मित पक्के भवनों में रहना उनके लिए निषिद्ध है।

जीवनचर्या चलाने के लिए संन्यासी को असंग्रही होना अनिवार्य है। संग्रह की प्रवृत्ति और मोहल्ला बसाकर रहना एकांत तपस्या की मूल भावना के खिलाफ है। उसे सबसे पहले इंद्रियों का सुख और स्वाद त्यागना होता है। उसके भोजन मांगने और पाने की विधि का भी संन्यास धर्म में स्पष्ट उल्लेख किया गया है। एक दिन में एक घर से एक बार में जितना मिल जाए, संन्यासी उसे भोजन के रूप में ग्रहण करेगा। अगर पहले घर और पहली आवाज पर भिक्षा न मिले, तो तीन बार से अधिक उस घर में भोजन के लिए वह आवाज नहीं देगा। इसी तरह भोजन न मिलने की स्थिति में वह एक दिन में तीन घरों में तीन बार से अधिक आवाज नहीं देगा। पका हुआ अन्न हाथों की अंजुलियों को जोड़कर ग्रहण करेगा और पानी के पास जाकर उस भोजन को अंजुली पर मुंह लगाकर ग्रहण करेगा। इसे करपात्री पद्धति कहते हैं। उसे केवल भोजन करना है, उसका स्वाद नहीं लेना है।

आदि शंकराचार्य के समय से दंडी संन्यासियों का उल्लेख मिलता है। यह दंड धारण आत्मरक्षा और पररक्षा, दोनों परिस्थितियों में शस्त्र का काम करने लगा। संन्यासी भी आत्मरक्षा को महत्व देने लगे। संग्रह वृत्ति और पद लालसा ने संन्यासी समाज को अखाड़ों और संप्रदायों में बांट दिया। भिक्षावृत्ति से पेट भरने को मधुकरी कहा जाने लगा। संन्यासी भी स्वाद ढूंढते भंवरे बन गए। उन्होंने समृद्ध परिवारों से मधुकरी का विकल्प चुना और आज वे औद्योगिक घरानों के लोगों जैसा समृद्ध जीवन जी रहे हैं। वे कहते हैं कि टिहरी बांध को तोड़ दो, वे उसकी कीमत दे देंगे। इतनी अकूत संपदा आज संन्यासियों के पास हो गई है। आश्रमों में फाइव स्टार होटलों से अधिक सुविधा संपन्न कक्ष हैं। हरिद्वार से गंगोत्री तक तपस्या के नाम पर मुफ्त में पाई हुई जमीनों पर पचास से लेकर तीन सौ कमरों के आश्रम मिल जाएंगे। ये यात्रियों से श्रद्धा शुल्क वसूल कर ठहराते हैं। पर्वतीय क्षेत्र के छोटे पेइंग गेस्ट टाइप योजनाओं के अंतर्गत खुले होटल घाटे में चल रहे हैं। पर इन आश्रमों पर होटल ऐक्ट की टैक्स संबंधी वैधानिक कार्रवाइयां नहीं हो सकती।

अभी लोहारीनाग-पाला विद्युत परियोजना मामले में गंगा की पवित्रता और अविरल धारा के नाम पर एक पूर्व इंजीनियर की भूख हड़ताल का साथ देते हुए संन्यासियों ने इस पर विचार नहीं किया कि गोमुख से रुड़की तक बने आश्रमों में सबसे ज्यादा बिजली की खपत है। कुंभ मेले में सारी सुविधाएं मुफ्त दी गई हैं। एयरकंडीशन के बिना कई संत रह नहीं सकते। हिमालय में तपस्या का हवाला देकर वे अपने कक्षों को ‘मिनी हिमालय’ का रूप दिए हुए हैं। कहां से आ रही है यह निर्बाध बिजली? क्या वे नहीं जानते कि निर्बाध बिजली आपूर्ति टिहरी बांध की देन है? लिहाजा सबसे पहले तो उन्हें गंगाजल से बनी बिजली का परित्याग कर देना चाहिए था। फिर यह भी समझना चाहिए कि गंगा को निर्मल बनाना है, तो यह विद्युत परियोजनाओं को रद्द करके संभव नहीं है। पावर हाउस से निकलने वाला गंगा जल सौ फीसदी निर्मल होता है। अगर कानपुर की गटर गंगा से मुक्ति पानी है, तो गंगा शुद्धीकरण के लिए जगह-जगह अनेक छोटे-छोटे पावर हाउसों का निर्माण करना जरूरी है। इससे देश की गरीबी भी मिटेगी। पावर हाउस नदी के जल को अवशोषित नहीं करते, इसलिए पानी की मात्रा वही बनी रहती है, जो टनल में प्रवेश से पूर्व में होती है, लेकिन स्वच्छता के स्तर पर पानी की गुणवत्ता बढ़ जाती है।

पहाड़ के लोगों की आजीविका के मूल साधनों में गंगा पुराने समय से शामिल है। पर्वतीय क्षेत्र में नदी तल से अधिक ऊंचाई पर खेती का काम होने के कारण गंगा सिंचाई का साधन नहीं बन पाई। लेकिन घराट यानी पनचक्की चलाने का पुराना साधन गंगा रही है। आधुनिक बिजलीघर दरअसल घराट के ही बड़े रूप हैं। इसलिए यह कहना झूठ है कि गंगा जैसी पवित्र नदी कभी नहरों और सुरंगों जैसी गुफाओं से नहीं गुजरी। कल्पना करें कि अगर बांध का आकार-प्रकार ब्रह्मा के कमंडल जैसा टोंटीदार बनाया जाए और उसमें अपने जन्मकाल जैसी स्थिति में गंगा पड़ी रहे और फिर टोंटी से उसी तरह पानी ओवरफ्लो की तरह प्रवाहित हो, जिस तरह ब्रह्मा ने अपने लोटे को भगीरथ की तपस्या के बाद शिव जी के सिर पर उंड़ेला था, तब क्या हम उस प्राचीन स्मृति को आधुनिक काल में साक्षात देखने की खुशी से लहालोट नहीं हो उठेंगे। जहां तक लोहारीनाग-पाला विद्युत परियोजना के विरोध का सवाल है, तो इसे पहाड़ के स्थानीय लोगों को मिलने वाले रोजगार के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। सीधी-सी बात है, पतितपावनी गंगा की निर्मलता का भ्रामक मुद्दा उछालकर संन्यासी क्या इस ओर सोच रहे हैं? आम लोगों के रोजगार और देश की खुशहाली को बाधित नहीं करना चाहिए।

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