व्यक्तिगत प्रयासों ने खोली तरक्की की राह

Author:चन्द्रशेखर तिवारी
Source:योजना, फरवरी 2011
.उत्तराखण्ड राज्य में जनपद चम्पावत विकासखण्ड के अन्तर्गत एक छोटा-सा गाँव है— तोली। यह गाँव जनपद मुख्यालय से 45 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। तोली गाँव जौलाड़ी ग्राम सभा का एक तोक है जिसमें तकरीबन 24 परिवार रहते हैं। तोली गाँव अपने मछली तालाबों व बेहतरीन सब्जी उत्पादन के लिए पूरे उत्तराखण्ड में जाना जाता है। मछली उत्पादकों के लिए यह गाँव आज एक मॉडल बन गया है। आज से दो दशक पूर्व इस गाँव में पानी व रोजगार दोनों की किल्लत थी। गाँव वालों को दूर से पानी ढोना पड़ता था साथ ही उनकी आर्थिक स्थिति भी कमजोर थी। लेकिन आज ऐसी स्थिति नहीं है। अब हर घर के आँगन में पानी पहुँचने के साथ-साथ विविध प्रकार की सब्जियाँ लहलहा रही हैं। गाँव में यह अद्भुत परिवर्तन किसी सरकारी योजना से नहीं आया है अपितु यह परिवर्तन इसी गाँव के निवासी कृष्णानन्द गहतोड़ी व पीताम्बर गहतोड़ी की सूझबूझ और प्रयासों से आया है।

उत्तराखण्ड सेवा निधि पर्यावरण शिक्षा संस्थान, अल्मोड़ा के मार्गदर्शन व आर्थिक सहयोग से संचालित संस्था पर्यावरण संरक्षण समिति के माध्यम से गहतोड़ी बन्धुओं ने स्थानीय क्षेत्र के दो दर्जन से अधिक गाँवों में जल-संरक्षण कार्य के अलावा पर्यावरण, बालवाड़ी व स्वच्छ शौचालय के प्रति भी लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया है।गाँव के मध्य बगड़ीघट नाम का एक गधेरा (बरसाती नाला) बहता है, इसमें उत्तर-पूर्व दिशा से 7-8 छोटे-छोटे गधेरे मिलते हैं। बरसात खत्म होने के बाद इन गधेरों में पानी धीरे-धीरे कम होने लगता है। गर्मी के दिनों में यह पानी पूरी तरह सूख जाता है। कहीं-कहीं पर नाममात्र का पानी दिखाई देता है। अल्प-मात्रा में मौजूद इस पानी को गहतोड़ी बन्धुओं ने अपनी तकनीक का इस्तेमाल कर प्लास्टिक पाइपों के माध्यम से घर-घर तक पहुँचा दिया है। इससे गाँव वालों को न केवल पीने का पानी मिल रहा है अपितु सब्जियों की सिंचाई व मछली-पालन में भी इस पानी का बखूबी इस्तेमाल हो रहा है।

प्लास्टिक पाइपों के जरिये पहुँचने वाले इस पानी का अधिकांश परिवारों ने संयुक्त उपयोग कर सामूहिक जल प्रबन्धन की नयी मिसाल प्रस्तुत की है। प्रत्येक परिवार द्वारा अपने घर में छोटे-छोटे टैंक बनाए गए हैं। अगल-बगल रहने वाले 3-4 परिवार बारी-बारी से इस पानी को अपने टैंकों में एकत्रित कर लेते हैं। सभी परिवारों द्वारा टैंकों में पानी भर लेने के बाद अतिरिक्त पानी को बड़े तालाब में डाल दिया जाता है। तालाब के पानी का उपयोग सब्जियों की सिंचाई व मछली-पालन में किया जाता है। वर्तमान में गाँव के 7-8 परिवारों ने इस तरह के तालाब बनाए हैं। 100 से 250 वर्गमीटर आकार के इन तालाबों से ये परिवार मछली-पालन करके अच्छी-खासी आय अर्जित कर रहे हैं। तालाब के पानी का उपयोग मूली, बैंगन, कददू, लौकी, खीरा, मिर्च, बीन व टमाटर आदि सब्जियों को उगाने में किया जा रहा है। सब्जी व मछली उत्पादन से गाँव वालों को अपने घर के भोजन के लिए ताजी सब्जी व मछलियाँ मिल रही हैं। साथ-ही-साथ स्थानीय लोहाघाट बाजार में मछलियों व सब्जियों के विक्रय से उन्हें भरपूर आय भी प्राप्त हो रही है। जिस कारण ग्रामीण काश्तकारों की आर्थिक स्थिति में पूर्व की तुलना में काफी सुधर आया है।

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तोली गाँव में बने ये तालाब पर्यावरण संरक्षण में भी मददगार साबित हुए हैं। आसपास के क्षेत्र में नमी बनाए रखने व जल-स्रोतों को रिचार्ज करने में ये तालाब सहायक सिद्ध हो रहे हैं। तालाब कच्चे होने के कारण इनसे रिसकर जा रहा पानी जल-स्तर को बढ़ाने में मददगार हो रहा है। नमी के कारण खेतों में अनाज की पैदावार भी बढ़ रही है।

उत्तराखण्ड सेवा निधि पर्यावरण शिक्षा संस्थान, अल्मोड़ा के मार्गदर्शन व आर्थिक सहयोग से संचालित संस्था पर्यावरण संरक्षण समिति के माध्यम से गहतोड़ी बन्धुओं ने स्थानीय क्षेत्र के दो दर्जन से अधिक गाँवों में जल-संरक्षण कार्य के अलावा पर्यावरण, बालवाड़ी व स्वच्छ शौचालय के प्रति भी लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया है। प्लास्टिक पाइपों के जरिये बून्द-बून्द पानी के उपयोग के इस सफल उदाहरण से सीख लेकर निकटवर्ती जौलाड़ी, बरौला, रौलामेल, बूंगा, कमलेख, पन्तोला, किमवाड़ी, ढरौंज व सिमलखेत सहित कई गाँवों के लोगों ने 57 से अधिक तालाब बना लिए हैं। इन तालाबों का उपयोग सब्जी व मछली उत्पादन में करके ग्रामीण लोग अपनी आजीविका चला रहे हैं। गहतोड़ी बन्धुओं द्वारा की गई इस सामाजिक पहल से आज यहाँ के इलाके में जो सुखद बदलाव देखने को मिल रहा है वह वास्तव में प्रशंसनीय है।

(लेखक दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र देहरादून में रिसर्च एसोसिएट हैं)
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