ये तालाब हैं ही नहीं तो पानी कहां से भरेगा?

Author:अरुण तिवारी
Source:नई दुनिया, 1 जुलाई 2011

ऐसा लगता है कि तालाबों के रचनाकारों को इस बात की परवाह ही नहीं है कि तालाबों में पानी रहे या न रहे। यही कारण है कि मनरेगा में रोजगार है, मजदूरी है, कमीशनखोरी है पर पानी नहीं है।

देश का खरबों रुपया खर्च करने के बाद भी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत बने तालाबों में आज बारिश का पानी नहीं है। ये लबालब भरे हुए कभी नहीं रहे, इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यह प्रश्न गंभीर इसलिए भी है कि इसका एक सीधा जवाब यह भी हो सकता है कि कभी नहीं! वजह यह कि ये तालाब हैं ही नहीं। ये तो मिट्टी की नाप के लिए बनाई गई चहारदीवारियां हैं। आखिरकार हर तालाब का अपना एक जलग्रहण क्षेत्र होता है। ढाल होता है। होने वाली बारिश, आने वाले पानी के वेग, उपयोग के प्रकार आदि के अनुसार एक पाल होती है। पाल का अपना एक अलग डिजाइन होता है। उत्तल, अवतल, कोहनीदार या सीधा। वह कैसा भी हो किंतु चारों तरफ से बंद कभी नहीं होता। मनरेगा के ढांचे तो चारों तरफ से बंद हैं। इन्हें जलकुंड भी तो नहीं कह सकते। जलकुंड के भीतर और बाहर के तल में गहराई का भारी भेद व चारों तरफ ढाल क्षेत्र अथवा पानी आने का एक सुनिश्चित प्रवाह मार्ग होता है।

बहरहाल, सरकारी इंजीनियर या ग्राम प्रधान कुछ भी कहें, तालाब को न जानने वाला भी इन ढांचों को देखकर बता सकता है कि इनमें पानी आने व जाने के दोनों रास्ते बंद हैं। ये तालाब जिस जमीन पर बने हैं, उनके रकबे को नजरअंदाज करके बनाए गए हैं। पुराने तालाब के भीतर खड़ी छोटी-छोटी चहारदीवारियां पैसे की बर्बादी की नुमाइश जैसी दिखती हैं। इनके लिए जगह का चयन करते वक्त सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज तालाब देखा गया। यह कदापि नहीं देखा गया कि उसमें आने वाले पानी के मार्ग में कहीं कोई इमारत या सड़क अवरोध बनकर तो नहीं खड़ी है। ऐसा लगता है कि इनके रचनाकारों को इनके पानीदार होने से कोई मतलब ही नहीं है। इसीलिए मनरेगा में रोजगार है, मजदूरी है, कमीशनखोरी है पर पानी नहीं है। समस्त भारत का यही चित्र है। कहीं-कहीं इन्हें नहर के पानी से भी भरा गया है। एक खाते से पानी निकालकर दूसरे खाते में डाल देने से पानी की कंगाली दूर नहीं होगी।

हमें याद रखना होगा कि मनरेगा का मकसद सिर्फ रोजगार देना न होकर गांवों में संसाधनों का ऐसा तंत्र विकसित करना भी है जिससे आगे ऐसी योजनाओं की जरूरत ही न रह जाए। स्थिति उलट है कि लोगों ने संसाधनों की चिंता छोड़कर मनरेगा की ओर ताकना शुरू कर दिया है। यदि हम मनरेगा के काम से सचमुच पानीदार होना चाहते हैं तो प्रत्येक ग्राम सभा को अपनी ऑडिट रिपोर्ट में लिखना होगा कि किस ढांचे में किस माह तक कितना पानी रुका, क्योंकि सरकारें इस सच को जानते हुए भी इन्हें सुधारने को तैयार नहीं हैं। इसके साथ ही साथ यह गांठ भी बांध ही ली जाए कि पानी को प्राथमिकता में लाने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकारी विभाग या किसी संस्था या व्यक्ति विशेष की नहीं है, हम सबकी है।

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